ब्रह्म सही है या ब्रम्ह?

मूल वैदिक उच्चारण ब्रम्ह[^1] था, परंतु लिखते समय ब्रह्म के रूप में लिखा जाता है। परिकल्पना यह है कि वैदिक काल में संस्कृत एक बोली जाने वाली भाषा थी। लेखन को कनिष्ठ माना जाता था क्योंकि बोली मे भव, आरोह अवरोह, स्वर, विराम के चलते अर्थ समृद्ध थआ और लेखन नीरस एवं शुष्क थआ।
लेखन किसी न किसी रूप में तब स्वीकार लिया गया , जब सरस्वती सभ्यता का व्यापारी संपर्क सुमेरियों (middle east) से हुआ।
यह लेखन क्यूनिफ़ॉर्म से प्रभावित था किन्तु बहोत सारी middle east लिपि की खिचड़ी जैसा था। हमे सरस्वती संस्कृति मे जो  seal मिल रहे है वह ये व्यापार की खिचड़ी लिपि मे लिखे गए है। बहारी / म्लेच्छ के व्यापार के अलावा, वैदिक समाज मे कनिष्ठ होने के कारण लेखन का प्रचालन नहीं था।

सुमेरकी भाषा मे क्यूनिफ़ॉर्म मे लिखते समय शब्द के अंत में “ह” नहीं लिखा जाता था। परिणामस्वरूप ये व्यापारी लेखन मे ब्रम्ह  का लिखित रूप ब्रह्म बन गया। आगे चलकर, 2000-1500 BC मे जब सरस्वती नदी लुप्त होने लगि और वैदिक समाज सरस्वती से अन्य प्रदेशों मे जाने लगा तो पूर्वानुपूर्व श्रुति को बचाने के लिए लेखन अधिक व्यापक रूप से अपनाया गया और कालक्रम मे middle eastern scrip के साथ व्यापार मे रूढ हुई लिपि मे से ब्राह्मी[^2] लिपि विकसित हुई। तब यह गलत लेखन स्थायी हो गया.

[^1]  : इस वैदिक परंपरा से चले आ रहे “रुद्रम् नमकम्” पाठमे प्रथम श्लोक मे ब्रम्ह का उच्चारण सुने (https://www.youtube.com/watch?v=PbGBn14Q-TU&t=210s)
[^2] : https://revistes.uab.cat/indialogs/article/view/v10-pillai/213-pdf-en